मोहनखेड़ा जैन तीर्थ में साधु एवं ट्रस्ट के बीच मामला गर्माया


प्रसिद्ध जैन तीर्थ मोहनखेड़ा में प्रबंधन और जैन संत के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। जैन संत जीतचंद्र विजयी जी महाराज ने अपनी मांगों को लेकर 21 जून से आमरण अनशन पर बैठने की चेतावनी दी है। इस घटनाक्रम से जैन समाज में आक्रोश और चिंता का माहौल बन गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पिछले दिनों मोहनखेड़ा जैन तीर्थ के एक प्रबंधकीय कर्मचारी पर आरोप लगा कि उसने जैन ट्रस्ट के अध्यक्ष हितेंद्रचंद विजयी जी महाराज, ट्रस्टी सुजानमल जैन एवं उनकी पत्नी की उपस्थिति में जीतचंद्र विजयी जी महाराज के साथ अभद्र व्यवहार किया और उन्हें मारने के लिए हाथ उठाया। इस संबंध में संत द्वारा राजगढ़ थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। वहीं, ट्रस्ट मंडल द्वारा भी इस मामले पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

इन घटनाओं के बावजूद ट्रस्ट मंडल और जैन आचार्य 18 एवं 19 जून को आयोजित गुरुदेव राजेंद्र जैन सूरीश्वरजी महाराज के द्विशताब्दी महोत्सव के अंतर्गत जाजम की बोली और गुरु प्रतिमा स्मृति उद्यान के भूमि पूजन जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। ट्रस्ट के कई ट्रस्टी भी मोहनखेड़ा में मौजूद थे, लेकिन आरोप है कि किसी ने भी जीतचंद्र विजयी जी महाराज से मुलाकात नहीं की और न ही उन्हें कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया।

जैन संतों और ट्रस्ट द्वारा अपने ही एक संत के साथ कथित रूप से किए गए इस व्यवहार को कई लोग अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे हैं। संत ने इसे अपना गंभीर अपमान बताते हुए 21 जून से आमरण अनशन करने की घोषणा की है। उन्होंने इस संबंध में धार कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, क्षेत्र के विधायक, मंत्री तथा विपक्ष के नेता उमंग सिंघार को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया है।

मोहनखेड़ा जैन तीर्थ के इतिहास में यह पहली बार बताया जा रहा है कि कोई जैन संत आमरण अनशन पर बैठने जा रहा है। इसे तीर्थ और उससे जुड़े श्रद्धालुओं के लिए चिंताजनक स्थिति माना जा रहा है। समाज के कुछ वर्गों का कहना है कि जिसने सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास का मार्ग अपनाया हो, उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार न केवल निंदनीय है बल्कि दादा गुरु की जन्मस्थली की गरिमा को भी प्रभावित करता है।

विवाद को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि मोहनखेड़ा में मौजूद अन्य साधु-साध्वियों और ट्रस्ट पदाधिकारियों ने मध्यस्थता कर मामले को सुलझाने का प्रयास क्यों नहीं किया। आरोप है कि यदि समय रहते संवाद स्थापित किया जाता तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती।

अब यदि 21 जून से संत आमरण अनशन पर बैठते हैं और उनके समर्थक बड़ी संख्या में मोहनखेड़ा पहुंचते हैं, तो कानून-व्यवस्था और सामाजिक माहौल पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में किसी भी संभावित आंदोलन या तनाव की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, यह भी चर्चा का विषय बन गया है।

वहीं, द्विशताब्दी समारोह के दौरान करोड़ों रुपये की बोलियां लगने और चंदे के उपयोग को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं। कुछ समाजजनों ने मांग की है कि प्राप्त चंदों और ट्रस्ट की वित्तीय गतिविधियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि सभी तथ्यों की पारदर्शी जानकारी सामने आ सके। उनका कहना है कि यदि किसी प्रकार की अनियमितता है तो उसकी जांच होना आवश्यक है।

फिलहाल, मोहनखेड़ा जैन तीर्थ का यह विवाद जैन समाज में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की निगाहें 21 जून को होने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।
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